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Showing posts from February, 2022

यारियां

वो यादें वो बातें वो किस्से पुराने से कभी तो ले आओ मेरे यारों के दिए हुए पल सुहाने से कोई तो लिखो ख़त जिस्को बार बार मैं पढूं कोई तो लिखो ग़ज़ल जिस्की मैं नुमायिश करु कोई तो लाओ वो फालतू की बातें करने के लिए वक्त कुछ तो दे जाओ जिसके लिए खुदा से मैं गुजारिश करु जिंदगी जैसे एक पल में सारी खुशियां दे गई तुम मिले तो जैसे जीने को वजाह दे गई कुछ तो दे जाओ वो पल पुराने से किससे भी होने चाहिए जिनको कट जाए बूढ़ापा सुनाने से ले आओ मेरे यार वो पल सुहाने से जब न चिंता थी न फ़िक्र कल की हर सुबह लाति नई यादें हर पल की जो हुआ उसे भूल सब मिट्टी पाओ जनाब कोई ज़रा जा कर मेरे दोस्त ले आओ वो कम पैसों में केई खुशियां खरीद देते थे और मुश्किल एक पर आए तो किसी से भी दुश्मनी मोल ले लेते थे वो बेज्जती करके भी हंसाते थे वो हर दिन मेरे दोस्त होने का फ़र्ज़ निभाते थे खून का रिश्ता नहीं था कोई उनसे मगर खून से ज़्यादा सगे मेरे वो कहते थे कोई तो ले आओ वो यार मेरे जो पल सुहाने थे कम पैसे में भी वो केई सारी खुशियां खरीद लेट थे  -गिलक्रिस्ट प्रेम

लफ़्ज़ों का खेल

आज फिर कुछ इस क़दर पिरोए जाने को लफ़्ज़ कर्राह रहे हैं कुछ भीगे पन्नो के ज़रिए से अपनी कहानी बता रहे हैं कुछ कलम से श्‍याही खर्च करा रहे हैं तो कुछ जज्बातों के आलम में ले जा रहे हैं कुछ आहें सिसका रहे हैं कुछ आधि पूरी ख्वाहिशें लेके आ रहे हैं कुछ खुदा से दरख्वास्त कर रहे हैं तो कुछ दिल में सहलाब ला रहे हैं कुछ दोस्तों के सामने मुस्काना रहे हैं तो कुछ बारिश से अपनी भीगी पलकें छुपा रहे हैं कुछ के दिल आज भी इज़हार से शर्मा रहे हैं तो कुछ अपनी कहानी लफ़्ज़ों से सुना रहे हैं के लिए नाम तो कई दिये लोगों ने तो कई लोगों ने बदनाम भी खूब किया है इतना बुरा भी नहीं शायद नहीं तो ग़ालिब यूं क्यों दीवाना हुआ घुमता तेरे माथे की बिंदी को कुछ इस कदर चुमता और मैं भी आज ग़ालिब बना यूं घुमता कुछ बे-खुद होकर निकलता तेरे दिल की गलियों से के एहसास तेरी रूह को मेरी मौजूदगी का होता -गिलक्रिस्ट प्रेम

अच्छा तो मैं चलता हूं

अजीब सि है ये जिंदगी  कभी भीड़ में हंसा देती है तो  कभी अकेले में रूला देता है  कभी महफिलों में अकेला सा कर देती है तो  रातों को खुश-नुमा सा  कभी जुल्फ़ों का अंधेरा होता है तो  कभी रातों का साया  कभी आखों में चमक होती है तो  कभी पालकों पर नमी  कभी चेहरे पर रौनक होती है तो  कभी गुमों का एहसास  कभी आखों में दुनिया होती है तो  कभी सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा  कभी हाथों को पकड़ने के वादे होते हैं तो  कभी हाथ छुड़ाने की कोशीशें  कभी साथ चलने की बातें होती हैं तो  कभी चार कदम भी मुश्किल लगने लगते हैं  कभी जिंदगी रुक सी जाती है तो कभी  बोहत तेज भगने लगती है  कभी रूह से रूह का ताल्लुक होता है तो  कभी अंजनों से बातें  कभी खुशी का एहसास होता है तो  कभी गम का सागर सहलाब सा ले आता है  कभी दोस्ती में गलियां होती हैं  तो कभी कुछ अनकहे वादे  कभी सात जन्म तक का साथ होता है तो  कभी एक अरसा भी साथ गुजरना मुश्किल  कभी बांहों में आराम होता है तो  कभी उन्हीं बांहों में घुटन ...

ये ज़िन्दगी

अजीब सि है ये जिंदगी  कभी भीड़ में हंसा देती है तो  कभी अकेले में रूला देता है  कभी महफिलों में अकेला सा कर देती है तो  रातों को खुश-नुमा सा  कभी जुल्फ़ों का अंधेरा होता है तो  कभी रातों का साया  कभी आखों में चमक होती है तो  कभी पालकों पर नमी  कभी चेहरे पर रौनक होती है तो  कभी गुमों का एहसास  कभी आखों में दुनिया होती है तो  कभी सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा  कभी हाथों को पकड़ने के वादे होते हैं तो  कभी हाथ छुड़ाने की कोशीशें  कभी साथ चलने की बातें होती हैं तो  कभी चार कदम भी मुश्किल लगने लगते हैं  कभी जिंदगी रुक सी जाती है तो कभी  बोहत तेज भगने लगती है  कभी रूह से रूह का ताल्लुक होता है तो  कभी अंजनों से बातें  कभी खुशी का एहसास होता है तो  कभी गम का सागर सहलाब सा ले आता है  कभी दोस्ती में गलियां होती हैं  तो कभी कुछ अनकहे वादे  कभी सात जन्म तक का साथ होता है तो  कभी एक अरसा भी साथ गुजरना मुश्किल  कभी बांहों में आराम होता है तो  कभी उन्हीं बांहों में घुटन ...

गुस्ताखियां

बे-परवाह गुस्ताखियां किये जा रहा हूं इस जिंदगी को बस यूं ही जिये जा रहा हूं गुमों के लबरेज़ होते पियालों को पिये जा रहा हूं हर घड़ी कतरे कतरे को ये पैगाम दिए जा रहा हूं कुछ नए सपने संजोय जा रहा हूं लैबों से निकली बातों को पन्नो पर कुछ इस कदर पिरोए जा रहा हूं पालकों को नम करके खुशी से आज यूं अपनी जिंदगी तेरे नाम पर किए जा रहा हूं क्यूंकि तुम्हें अंदाज़ा ही कहां के कितने अपने हैं ये गमों के साये जो हर रात हमें अपनी बाहों में ले लेते हैं जो मुझे मुझसा कर देते हैं हर पल में तुझसे अलग होने का एहसास दे देते हैं यादों को नई जिंदगी और हर पल मुझे अपनी बाहों में भर लेते हैं तुझे अंदाज़ा कहाँ के ये गमों के साए हर दिन एक नई कहानी ले आते हैं कुछ कोहरे पन्नो पर और कुछ दिल पर लिख जाते हैं तुझे कहाँ अंदाज़ा कि क्या शिद्दत है इनमे मेरे गमों के लिए जो हर घड़ी मेरे साए में रह लेते हैं हर पल साथ ले चलते हैं कभी-कभी गुफ्त-ए-गु कर लेते हैं तो कभी आंखें भर देते हैं बस इसिलिए आज फिर यूं बे-परवाह गुस्ताखियां किये जा रहा हूं इस जिंदगी को बस यूं ही जिये जा रहा हूं -गिलक्रिस्ट प्रेम

ख़्याल

अभी शायद तुम्हें अंदाज नहीं या अभी शायद तुम्हें पता नहीं कितने ख़ास थे वो लम्हें जो गुज़ारे तुम्हारे साथ थे कुछ सांसें ज़्यादा दे जाते हैं तो कुछ पल रंगीन और खुशनुमा कर गुज़रते हैं शायद एहसास नहीं या शायद दिखा नहीं मगर ख़्यालों में अगर किसी की बातें हैं तो वो तुम हो ख़्वाबों में आना जाना है अगर किसी का तो वो तुम हो कभी ख्वाबों से निकल कर असल जिंदगी में आओ की एहसास हो हमें भी की ख़ुशी दिखती कैसी है जवाब अपना हमें सुनाती तो जाओ एक झलक के लिए बे-ताब हुए बैठे हैं हर पल में तुम्हारा ज़िक्र लिए बैठे हैं अब तो रातें भी परशान हैं न आस खतम होती है न तुम्हें देखने की प्यास आज कुछ दिन हो गए उनका कोई जवाब न आया.. आज फिर अंधेरी रात में छा गया सन्नाटो का साया। कहते तो‌ थे के न जी पाएंगे हमारी यारी के बिना... आज फिर उन्होंने सच को झूठ और झूठ को सच बनाया कुछ इस क़दर उनके दूर जाने के ख़्यालों ने सताया की जीने का ख़्याल भी दिमाग में ना आया क्या बताएं की किस क़दर बे-खुद हुए बैठे हैं आज फ़िर हम तुम्हारी मोहब्बत में ग़ालिब बने बैठे हैं -गिलक्रिस्ट प्रेम और सिद्धार्थ ठाकुर

महरूम वो भी कहीं

ज़लील हुए हैं हम कुछ इस कदर तेरे प्यार में की बेवफाई से वफ़ा सीख ली ऐ हुस्ना कब तक महरुम रखोगी अपने दीदार से हमें जो खाता नहीं करी उसकी साज़ा भी क्यों ही मिली तेरी जुल्फ़ों में यूं खो जाने की गुज़ारिश थी जैसी कड़ी धूप को रात के सुकून की ख्वाहिश थी.. जैसे उनको बरिश में भीगने की ख्वाहिश थी... उस ही तरह मुझे उसके होंठों से बारिश को चखने की ख्वाहिश थी.. पूरी ना हुई ये सभी ख़्वाइशें, क्यूंकि हमारी ज़िंदगी तो उनके लिए बस एक नुमाइश थी पलकों से नमकीन पानी न गिरने देने की गुज़ारिश थी साथ में 7 जनम रहने की फ़रमाइश थी खैर ये तो सब कहने की बातें हैं मगर तेरे साथ चलने का सपना था क्योंकि लगा मुझे तू कुछ अपना था तेरे रौनक से बिस्मिल्लाह हो हर सुबह की ऐसी गुज़ारिश है तेरी बाहों के आंगन में दम तोड़ने की ख्वाइश है एक आरजू लिए बैठे हैं तेरी खुशबू में खोए बैठे हैं घायल हैं हम या झूम रहे हैं तेरी आशिकी में दीवाने हुए हम बैठे हैं ना रातों का गुज़रना मालूम पढ़ाता है ना दिन का ढलना न बारिश का आना न इन हवाओं का रुख बदला तो बस इसिलिये  तेरे हर पल को खुशनुमा कर गुज़रता हूं तेरे साथ जीने की ख़्वाइश रखता हूँ ह...