ख़्याल

अभी शायद तुम्हें अंदाज नहीं
या अभी शायद तुम्हें पता नहीं
कितने ख़ास थे वो लम्हें जो गुज़ारे तुम्हारे साथ थे
कुछ सांसें ज़्यादा दे जाते हैं
तो कुछ पल रंगीन और खुशनुमा कर गुज़रते हैं
शायद एहसास नहीं या शायद दिखा नहीं
मगर ख़्यालों में अगर किसी की बातें हैं तो वो तुम हो
ख़्वाबों में आना जाना है अगर किसी का तो वो तुम हो
कभी ख्वाबों से निकल कर असल जिंदगी में आओ
की एहसास हो हमें भी की ख़ुशी दिखती कैसी है
जवाब अपना हमें सुनाती तो जाओ
एक झलक के लिए बे-ताब हुए बैठे हैं
हर पल में तुम्हारा ज़िक्र लिए बैठे हैं
अब तो रातें भी परशान हैं
न आस खतम होती है न तुम्हें देखने की प्यास
आज कुछ दिन हो गए उनका कोई जवाब न आया..
आज फिर अंधेरी रात में छा गया सन्नाटो का साया।
कहते तो‌ थे के न जी पाएंगे हमारी यारी के बिना...
आज फिर उन्होंने सच को झूठ और झूठ को सच बनाया
कुछ इस क़दर उनके दूर जाने के ख़्यालों ने सताया
की जीने का ख़्याल भी दिमाग में ना आया
क्या बताएं की किस क़दर बे-खुद हुए बैठे हैं
आज फ़िर हम तुम्हारी मोहब्बत में ग़ालिब बने बैठे हैं
-गिलक्रिस्ट प्रेम और सिद्धार्थ ठाकुर

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