महरूम वो भी कहीं
ज़लील हुए हैं हम कुछ इस कदर तेरे प्यार में
की बेवफाई से वफ़ा सीख ली
ऐ हुस्ना कब तक महरुम रखोगी अपने दीदार से हमें
जो खाता नहीं करी उसकी साज़ा भी क्यों ही मिली
तेरी जुल्फ़ों में यूं खो जाने की गुज़ारिश थी
जैसी कड़ी धूप को रात के सुकून की ख्वाहिश थी..
जैसे उनको बरिश में भीगने की ख्वाहिश थी...
उस ही तरह मुझे उसके होंठों से बारिश को चखने की ख्वाहिश थी..
पूरी ना हुई ये सभी ख़्वाइशें, क्यूंकि हमारी ज़िंदगी तो उनके लिए
बस एक नुमाइश थी
पलकों से नमकीन पानी न गिरने देने की गुज़ारिश थी
साथ में 7 जनम रहने की फ़रमाइश थी
खैर ये तो सब कहने की बातें हैं
मगर तेरे साथ चलने का सपना था
क्योंकि लगा मुझे तू कुछ अपना था
तेरे रौनक से बिस्मिल्लाह हो हर सुबह की ऐसी गुज़ारिश है
तेरी बाहों के आंगन में दम तोड़ने की ख्वाइश है
एक आरजू लिए बैठे हैं
तेरी खुशबू में खोए बैठे हैं
घायल हैं हम या झूम रहे हैं
तेरी आशिकी में दीवाने हुए हम बैठे हैं
ना रातों का गुज़रना मालूम पढ़ाता है
ना दिन का ढलना
न बारिश का आना न इन हवाओं का रुख बदला
तो बस इसिलिये
तेरे हर पल को खुशनुमा कर गुज़रता हूं
तेरे साथ जीने की ख़्वाइश रखता हूँ
हवाओं के जैसे तुझे छू कर यूं गुजरता हुं
आज स्याही से ये पैगाम लिख़ता हूं
तेरी गलियों को अपनी कलम से रंगीन कर गुज़रता हूँ
क्यूंकि
तेरे दिल की गलियों में सिर्फ मैं बिकता हूं
-गिलक्रिस्ट प्रेम और सिद्धार्थ ठाकुर
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