लफ़्ज़ों का खेल

आज फिर कुछ इस क़दर पिरोए जाने को लफ़्ज़ कर्राह रहे हैं
कुछ भीगे पन्नो के ज़रिए से अपनी कहानी बता रहे हैं
कुछ कलम से श्‍याही खर्च करा रहे हैं
तो कुछ जज्बातों के आलम में ले जा रहे हैं
कुछ आहें सिसका रहे हैं
कुछ आधि पूरी ख्वाहिशें लेके आ रहे हैं
कुछ खुदा से दरख्वास्त कर रहे हैं
तो कुछ दिल में सहलाब ला रहे हैं
कुछ दोस्तों के सामने मुस्काना रहे हैं
तो कुछ बारिश से अपनी भीगी पलकें छुपा रहे हैं
कुछ के दिल आज भी इज़हार से शर्मा रहे हैं
तो कुछ अपनी कहानी लफ़्ज़ों से सुना रहे हैं के लिए
नाम तो कई दिये लोगों ने
तो कई लोगों ने बदनाम भी खूब किया है
इतना बुरा भी नहीं शायद नहीं तो ग़ालिब यूं क्यों दीवाना हुआ घुमता
तेरे माथे की बिंदी को कुछ इस कदर चुमता
और मैं भी आज ग़ालिब बना यूं घुमता
कुछ बे-खुद होकर निकलता तेरे दिल की गलियों से
के एहसास तेरी रूह को मेरी मौजूदगी का होता
-गिलक्रिस्ट प्रेम

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